मकड़ी

मकड़ी 

(नात्सी जर्मनी और आज)

 

मकड़ी आठों पैर फैलाये, दीवार पर चढ़ रही है आज,

लपेट लपेट कर थूक दीवार पर मारती है  

निरत,

बिना याद औटाती है शब्द, 

बिना मुहँ घुमाती है ज़ुबान,

जंजाल बुन रही है

चुपचाप  

 

उगलती कीचड़ में नहाई पुरानी दीवार  - दरारों वाली  

पपड़ियों से उकेर रही है लकीर,

नक्शा दिखा रही हो गोया, 

‘वो इस ओर से आया था 

फिर गया उस ओर,

यहाँ बैठ कर थोड़ी देर रोया भी था,

शायद...’

 

रौशनी की खुसफुसाती किरचें

खिड़कियों को कर देती हैं बंद, 

कुलबुलाते हैं खाक़ के सीनों में  

औंधे अँधियारे के बातूनी तिलिस्म, 

हाथ, चाँद, लाल किताबें, चन्द सलेटी कमल,  

तोड़-तोड़ के सजा रहे हैं घर जिनसे

वसीयतों के दावेदार, 

मरी ख़ुशबू से मुँह चुराती हवाएँ,  

रुख़े थूक का ताब-ए-फरमान लिए  

इधर जाती हैं तो कभी उधर,

याद का हर नया झोंका एक वसीयत है,

कुछ भी लिखवा लो इनसे 

 

रवाँ करते हैं चिमनियों को

थाल में सजे कड़वे बादाम,  

जले पैर, भुन्जे बाल, बंद बस्ते और दांत, 

भड़भूजे की आग में

एक बार फिर शोला!

घिरती शाम की फैलती छायाएं 

आठों दिशाओं से करती हैं अभिनन्दन, 

सम्मानित मकड़ी आठों पैर उठा 

समेटती है कोख में, एक बार फिर  

- रक्तबीज, रक्तबीज, रक्तबीज

 

उधर दरवाज़े की अधजली झिर्रियों में 

सो रहे हैं कुछ मौसमी मच्छर, 

नातवान छिपकलियां, अधसिंके मेंढक,

और दीमक की छाती में मुंह गड़ाए 

मैं,

- लपेट रखे हैं लोहे की सांकल से जिगर हमने, 

खुल न जाये भड़ाक, शगाफ़ हुए पल्ले, 

लुढ़क पड़ें नीचे !  

- चिमनियों से आग से बचें

तो मकड़ी के जाल में फँसें,

सहला के समेट लें रेशमी सख्त बाँहों में

आरती के आठों थाल,   

 

तारीख़ को जलते चरागों में ताका करें – वसीयतों के हक़दार

पूछे हाथ पकड़ कर हमसे – आने वाली जमात

"हो रहा था ये सब, तब कहाँ थे आप?"

 

"अरे हम? शामिल?

हाय! हाय!

हमें तो पता ही न था!"

Contact

Please address queries to
wingsonfish@gmail.com