मेरे चौराहे में गाँव - शेफ़ाली फ्रॉस्ट

1. आरा - मुग़लसराय बागमती एक्सप्रेस
भूल आया पलटफारम पर
पानी से भरी सुराही
भारी बक्सा हरा होल्डाल
गुज़रती जा रही है
गठरी पकड़े महतारी की
सुबकती हुई बड़-बड़
पसरती जा रही है कानों में
लाल-पीली रेल.

2. छपरा का रिक्शेवाला
चढ़ी हुई है पनीली पतीली पर
जलती हुई बात
एक गीत का छिलका
उतर कर सब्ज़ियों से लगा रहा है आवाज़
फफोलों वाले तवे पर दरकती हैं रोटियाँ
चटखते हुए चिमटे से उड़ रहा है धुंआ
सिकुड़ रहा है अलमोनियम की परात में
सरसों का चमकीला तेल
उतर रहा है सड़कों के किनारे
अद्धे वाली बोतल का नशा फिर आज की रात
‘शहर आने का
गाँव का घर बनाने का
फिर लौट जाने का ...’

3. मालदा का रिक्शेवाला
वो अधूरा तो था नहीं
जो
पूरा होने का इंतज़ार करता

4. मरा हुआ रिक्शेवाला
वह,
जिसका सुन्दर नाम नहीं है कोई
बीस रुपया सवारी से कर रहा है तक़रार
मुड़े हुए नोट से निकाल रहा है
सड़ा हुआ टेप
पोंछ रहा है माथा
गमछे के पसीने से
वह,
जो रोटी के नाम पर अब भी उबल रहा है
नमक के दाम पर अब भी पिघल रहा है
शहर की सड़कों में आवाज़ बन कर उड़ गया है
दस मिनट हुए, ब्लूलाइन के पहिये में मुड़ गया है
वह,
जिसका सुन्दर अंत नहीं है कोई
उस रिक्शेवाले पर
पसर कर बैठा है चौड़ा आदमी
फैल रहा है खून जैसा आगोश में उसके
कर रहा है इसरार
'सेक्टर छियालिस का कितना लोगे -
अरे चलो भी!
अभी मरे नहीं कहलाते तुम...'

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