दौड़ रहा है गाँव...

तान कर बन्दूक पड़ोसियों ने जहाँ
दाग दी उस किताब में
जिसकी बेमेल जिरह
काली पड़ती लाल लकीर है
- बिखरे हैं नदीपार स्कूल में
पढ़ते बच्चों के अदना शव
- बिलख रहा है आँगन माँबाप का

पटे हैं दौड़ने वालों से जंगलों के दलदल
- खटिया तले आँख मिचमिचाती बुढ़िया
- दो दुधमुंहे धड़, चलने से पहले घुटना घसीटते
- हंसिया पकड़े हाथ, जिनका पेट फूल कर कुप्पा है
- बेमेल रबड़ की चप्पल, कंधे से चिरी कमीज़
- आटा, दाल, चावल
- फ़ंगस लगे परांठे चार
- तीन मुर्गी के अंडे अदद
- दुम दबाये कुतिया एक
शकल मेरी मौत की है वो ज़िन्दगी,
जो अब इस गाँव में घर नहीं बसाएगी ।

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