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अख्तर उल ईमान

मेरे लिए वो अख्तर बाबा थे. सड़क के किनारे चाय के साथ ककड़ी और सिंघाड़ा खिलाने वाले, अख्तर बाबा.जब पहलेपहल उनको जाना, उनकी नज्में उन्ही की ज़ुबानी सुनी, एक नहीं, कई-कई बार सुनी. मुझे ... Read More.

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नंगा बच्चा    जब कुछ नहीं था तब आते थे सैलाब, अटक फैल बिखर जाता था पन्ने के ठीक बीच बाँहों के पैर पसारे  कागज़ पर, कलम के वजूद से बकार  बिखरा अनगढ़ अबाध, मैं हूँ का अहंकार... Read More.

2018 की पहली पोस्ट - शेफाली फ्रॉस्ट की नई कविता

शेफाली फ्रॉस्ट का पहला संग्रह ‘अभी मैंने देखा’ पिछले साल अन्तिका प्रकाशन से छप कर आया है. इस घटना को मैं व्यक्तिगत रूप से हिन्दी कविता में एक अलग तरह की अनूठी, जनधर्... Read More.

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